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Pravachan

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जानना और मानना दोनों दो चीज है

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ दश पुदगलास्तिकाय का उल्लेख किया गया है और इसके साथ ही ठाणं आगम के वाचन की सम्पन्नता की भी घोषणा कर रहा हूँ | एक लोक के ६ द्रव्यों में से एक है – पुद्गल | ६ द्रव्यों में से एक पुद्गल ही ऐसा है जो आखों से देखा जा सकता है | हालांकि सारे पुद्गल मूर्त नहीं होते | परमाणु को आँखों से नहीं देखा जा सकता | दश गुण वाले पुद्गल भी अनंत हैं, कोई काला, कोई पीला, कोई नीला तो कोई सफ़ेद | इनमें गुणात्मकता का भी तारतम्य रहता है व अनेक विकल्प भी होते है | स्थान सिर्फ पुद्गल ही रोकता है, यह अवरोधक भी होता है व काम आने वाला भी | पुद्गल से हमें बहुत सहयोग भी मिलता है | जानना और मानना दो बात हैं | ठाणं आगम ३२ आगमों में से एक है व इसमें अनेक विषयों पर प्रतिपादन भी मिलता है, ११ अंगों का भी बड़ा महत्व है | आचार्य अभयदेव सूरी ने इसकी टीका भी लिखी है, पर मूल आगम तो मूल ही है | आगमों में ज्ञान का भंडार है, हम आगमों का स्वाध्याय करते रहें | आगम व्याख्यान का आभूषण है | आगम परम्परा के पठन, पाठन व वाचन का विकास होता रहे, यह अपेक्षित है |

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कुछ अनहोनी घटनाएँ, अच्छेर का रूप

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ दश अच्छेर घटनाएँ होती है | सृष्टि के कुछ नियम होते हैं और सामान्यतया सृष्टि के नियमों के आधार पर ही सब चलता है, पर कभी-कभी इसका उल्लंघन भी हो जाता है, इसे आश्चर्य या अच्छेर कहा जाता है | गत तीर्थंकर काल की दश ऐसी घटनाएँ १. उपसर्ग – भगवान महावीर को केवल ज्ञान प्राप्ति के बाद भी अनेक देव-कृत व मनुष्य कृत उपसर्गों व कष्टों का सामना करना पड़ा व प्रयोगों द्वारा उन्हें पीड़ित किया गया २. गर्भ-संहरण – महावीर का गर्भ संहरण कर देवानंदा ब्राह्मणी के गर्भ से क्षत्राणी त्रिशला के गर्भ में स्थानांतरित किया जाना ३. मल्लिनाथ स्त्री–साध्वी का तीर्थंकर बनना ४. अभावित प्रवचन – तीर्थंकरों की देशना का खाली जाना जैसे भगवान महावीर का प्रथम प्रवचन ५. द्रोपदी के अपहरण पर कृष्ण का अपर-गंगा नगरी में जाना ६. महावीर जब कौसम्बी नगरी में थे तब चंद्र और सूर्य का मूल विमान सहित पर धरती पर आना ७. हरिवंश कुल की उत्पति का होना ८. चमर का उत्पाद – सौधर्म देवलोक के इंद्र का ऊपर चले जाना ९. १०८ आत्माओं का एक समय में निर्ग्रन्थ वेश में सिद्ध बन जाना व उत्कृष्ट अवगाहना में मोक्ष का वरण करना १०. असंयमी की पूजा – अल्पज्ञानी को बहुज्ञानी समझकर पूजा करना | जिसकी पूजा की जाती है वह बड़ा प्रसन्न हो जाता है | इन १० अच्छेरों में ५ भगवान महावीर से संबंधित है | कोरोना का प्रकोप भी इस समय की एक आश्चर्य जनक घटना मानी जा सकती है | हम हर स्थिति में संयमित रहें |

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शरीर बड़ा न भी हो तो तेजस्वी बनें

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ तेजो लब्धि के उपयोग के बारे में बतलाया गया है | तेजस्विता सम्पन्न व्यक्ति बड़ा व महान होता है, आकार, प्रकार से बड़ा होने वाला बड़ा नहीं होता | विशालकाय हाथी को छोटा सा अंकुश वश में कर लेता है, सघन अंधकार को एक छोटा सा दीपक मिटा देता है, विशाल पहाड़ को छोटा बज्र चूर-चूर कर देता है | व्यक्ति शरीर से बड़ा न होने पर भी बलवान हो सकता है | साधु व देव तेजो-लब्धि से सम्पन्न होते है | साधु छ्द्मस्त होते है, उन्हें गुस्सा भी आ सकता है व भूल भी हो सकती है | जिसे लब्धि प्राप्त हो वह किसी को परितापित न करे १. लब्धि-प्राप्त साधु किसी पर कुपित होकर अपनी लब्धि का प्रयोग कर किसी को भस्म कर दे २. देव किसी साधु की अवहेलना करने वाले पर लब्धि का प्रयोग कर उसे भस्म कर से ३. दोनों मिलकर किसी को भस्म कर दे ४. साधु किसी के फोड़े उत्पन्न कर भस्म कर दे ५. देव किसी के फोड़े उत्पन्न कर उसे भस्म कर दे ६. दोनों मिलकर फोड़े उत्पन्न कर दे ७. साधु अपने तेज से फोड़े के साथ फुंसियों से भस्म कर दे ८. देव ऐसा कर के किसी को भस्म कर दे ९. साधु व देव मिलकर ऐसा कर दे १०. साधु अवहेलना करने वाले पर लब्धि का प्रयोग करता हो लेकिन यदि वह खुद लब्धि-सम्पन्न हो तो उस पर वह प्रहार असर नहीं करता, वह पुनः प्रहार करता है लेकिन साधु के अन्दर प्रवेश न करने की स्थिति में उसे ही लौटकर भस्म देता है | दूसरे का विनाश करने वाला खुद उसका शिकार होता है | अपने तेज व मंत्र-तंत्र विद्या का दुरूपयोग कर किसी न अनिष्ट करना व दुर्भावना रखना श्रेयस्कर नहीं होता |

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चारित्र साधन व सिद्धि साध्य, मंजिल

चारित्र साधन व सिद्धि साध्य, मंजिल

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ दश प्रकार के अनुत्तर केवली के गुणों का वर्णन किया गया है | अनुतर – किसका कोई उतर न हो, जो सर्वोत्कृष्ट हो | वे दश गुण हैं १. अनुत्तर-ज्ञान – उत्कृष्ट ज्ञानी, जिनसे ज्यादा ज्ञान किसी के पास न हो २. अनुत्तर-दर्शन – जिन्हें पूर्ण केवल-दर्शन प्राप्त हो गया हो ३. अनुत्तर-चारित्र – जिन्हें सबसे ऊपरवाला यथाख्यात चारित्र प्राप्त हो गया हो, औपसमिक चारित्र ११ वें गुणस्थान में जहाँ से फिर नीचे जाना पड़ता है, पर यथाख्यात चारित्र प्राप्ति के बाद सीधा मोक्ष-गमन ४. अनुत्तर-तप – सबसे ऊंचा व भाव-पूर्ण ध्यान ५. अनुत्तर-वीर्य – पूर्ण-शक्ति सम्पन्नता ६. अनुत्तर-क्षांति – क्षमा व धैर्य का उत्कर्ष ७. अनुत्तर-मुक्ति – कामना-लोभ आदि से पूर्ण मुक्तता ८. अनुत्तर-आर्जव – ऋजुता, सरलता व छलकपट से पूर्ण मुक्ति ९. अनुत्तर-मार्दव – पूर्ण निरभिमानता व अहंकार-मुक्ति १०. अनुत्तर-लाघव – पूर्ण हल्कापन कोई संग्रह की भावना का भी भार नहीं | केवली तो पूर्ण अनुत्तर होते है पर हमारा भी प्रयास रहे कि उनसे हम बहुत नीचे तो न रहें | सम्यक ज्ञान, दर्शन, चारित्र में भी आगे बढ़ें, कामनाओं, गुस्से को व अहंकार को भी कम करें व अपने को वीर्य व शक्ति से सम्पन्न बनायें व ऋजु बनते हुए उस दिशा में प्रस्थान करें व अनुत्तर केवली बनने का लक्ष्य भी रक्खें | शुद्ध-भाव का संकल्प होता तो सफलता भी मिलती है |

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कुल को पवित्र व मर्यादित बनाने-वाला पुत्र

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ दश प्रकार के पुत्रों का उल्लेख किया गया है | पुत्र वह जो कुल को पवित्र बनाते हुए उसकी मर्यादाओं का पालन करता है | १. आत्मज-पुत्र – पिता के माध्यम से पैदा होने वाला २. क्षैत्रजपुत्र - नियोग-विधि से ३. दत्तक-पुत्र, गोद लिया हुआ पुत्र ४. विधा-पुत्र व शिष्य – ज्ञान लेनेवाला पुत्र ५. ओरस-पुत्र – किसी के स्नेह भाव व सेवा भाव से ६. मौखर-पुत्र – वाक् पटुता के कारण स्वीकृत पुत्र, मैं तो आपका बेटा ही हूँ ७. संगीर-पुत्र बहादूरी व पराक्रम के कारण बनने वाला ८. संवर्धित-पुत्र – कोई अनाथ बच्चा गोद लेकर आ गया ९. औपयाचित-पुत्र – देवी-देवता की पूजा आराधना से प्राप्त पुत्र १०. धर्म-पुत्र – धर्म से प्रभावित होकर ज्ञान प्राप्त करने वाला पुत्र | अच्छा पुत्र वह होता है जो कुल व उसकी मर्यादाओं की रक्षा करने वाला हो | पुत्र माँ-पिता दोनों का होता है | सब पुत्रों में क्षमताओं का तारतम्य होता है | कोई कोई पुत्र अपने चारित्र व योग्यता से पिता से भी आगे निकल जाता है, यह पिता के लिए गौरव की बात है | घड़े से पैदा होने वाले अगस्य ऋषि समुद्र को भी पी गए | पुत्र को सक्षम बनाने का दायित्व माँ-बाप का व माँ-बाप की सेवा का दायित्व पुत्र का होता है | दोनों अपने अपने दायित्व का पालन करें | बेटा कितना हो बड़ा हो जाय – माँ तो माँ ही होती है | माता, पिता, गुरु व सहयोगी के उपकार को कभी न भूलें |

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स्थविर वह जो ज्येष्ठ व बड़ा होता है

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ दश प्रकार के स्थविर का उल्लेख किया गया है | जो वरिष्ट व बड़ा होता उसे स्थविर कहा जाता है | बड़ा होने के दश प्रकार – १. गाँव-स्थविर – जो गाँव की व्यवस्था का भार ले, जैसे गाँव का मुखिया, सरपंच आदि २. नगर-स्थविर – नगरपालिका का अध्यक्ष आदि ३. राष्ट्र-स्थविर – राष्ट्र का अधिकृत व्यक्ति जैसे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि ४. प्रशास्ता-स्थविर - धर्म का प्रवचनकार व ज्ञान प्रदान करने वाला, इस श्रेणी में तीर्थंकर तो सर्व श्रेष्ट होते ही है व उनके प्रतिनिधि व ज्ञानी भी उस कार्य को संपादित कर सकते है ५. कुल-स्थविर ६. गण-स्थविर ७. संध–स्थवि र | ये सब लौकिक व आध्यात्मिक दोनों हो सकते हैं, व्यवस्था का अधिकारी यदि तीन आचार्य हो तो वह गण व तीन से अधिक आचार्य हो तो संध, जो ज्ञान को गतिमान करता है ८. जाति-स्थविर जो उम्र के आधार पर होते है, ६० साल से ज्यादा उम्र वाले लोग इस श्रेणी में आते है ९. श्रुत-स्थविर – जो ज्ञान की दृष्टि से बड़े होते हैं १०. पर्याय-स्थविर – २० वर्ष से ज्यादा जिनका संयम पर्याय, साधुत्व पर्याय हो वे पर्याय-स्थविर की कोटि में आते हैं | वृद्ध के प्रति मान, अनुकम्पा व सुविधा देने की भावना रहे, ज्ञानी का सम्मान हो व संयम-पर्याय में बड़ों का विनय रहे | इन दश को यदि चार श्रेणियों में बांटा जाय तो – उम्र, ज्ञान, संयम पर्याय व अधिकार के संदर्भ में बांटा जा सकता है, पर संयम पर्याय का महत्व सर्वाधिक है व वे सबसे बड़े भी |

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धर्म के अनेक संदर्भों में अलग अर्थ

धर्म के अनेक संदर्भों में अलग अर्थ

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ दश प्रकार के धर्मों का उल्लेख किया गया है | धर्म शब्द अनेक संदर्भों में प्रयुक्त होता है | अध्यात्म के संदर्भ में धर्म को आत्म शुद्धि, आत्म-कल्याण, दुर्गति से बचाव व आत्म-उन्नयन का साधन माना गया है | धर्म का दूसरा अर्थ है – कर्तव्य का पालन व व्यवस्थाओं का प्रबंधन, यहाँ सावध-निरवध की बात को गौण किया गया है | तीसरा गति में सहायक द्रव्य - धर्म | दश प्रकार के धर्मों में तीनों समाविष्ट है – १. गाँव-धर्म – गाँव की व्यवस्था व सार-संभाल २. नगर-धर्म - नगर की व्यवस्था व नगरपालिका के नियमों का पालन ३. राष्ट्र-धर्म – राष्ट्रीय दायित्व व व्यवस्थाओं का पालन | राजतंत्र में राजा व लोकतंत्र में राष्ट्रपति व प्रधान-मंत्री आदि की व्यवस्थाएं ४. पाषंड,श्रमण-धर्म ५. कुलधर्म – कुल की मर्यादाओं का पालन ६. गण-धर्म ७. संघ-धर्म – संघ की व्यवस्थाओं का परिपालन ८. श्रुत-धर्म – ज्ञानाराधना ९. चारित्र-धर्म – संयम की साधना व आराधना १०. अस्तिकाय-धर्म | गाँव व नगर के प्रति कर्तव्य-निर्वाह तथा राष्ट्र की सुरक्षा | सज्जनों की रक्षा, दुर्जनों पर अनुशासन व आश्रितों का भरण-पोषण | परिवार के हित के सामने व्यक्तिगत गौण हो, गाँव-नगर के लिए परिवार-हित गौण हो राष्ट्र-हित के लिए नगर-हित गौण हो व आत्म-हित के लिए अन्य सभी हित को गौण कर दो | बड़े हित के लिए छोटे हित को गौण कर कर दो | आत्म कल्याण के लिए हमें श्रुत व चारित्र धर्म की आराधना करनी चाहिए |

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तपस्या सिर्फ निर्जरा के लिए ही हो

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ दश प्रकार की अनुशंसाओं व इच्छाओं का उल्लेख किया है | वे दश हैं – १. इह-लोक में चक्रवर्ती राजा आदि की इच्छा २. पर-लोक में उच्चपदों, स्वर्ग व इंद्र बनने की आशंसा ३. इह-लोक तथा परलोक दोनों में उच्च-पद की आशंसा ४. दीर्घ-जीवन जीने की आशंसा ५. मान की आशंसा व इच्छा ६. काम की इच्छा, अच्छे शब्द, रूप, दृष्य, पहाड़, समुद्र व मनमोहक दृश्य देखने की इच्छा ७. भोग – सुखदायी गंघ व स्पर्श की इच्छा, कामना ८. अधिक लाभ व लोभ की इच्छा व उसके माध्यम से कीर्ति पाने की अनुशंसा ९. पूजा न पूजनीयता की आशंसा १०. मेरा सत्कार हो सम्मान हो, ऐसी इच्छा व आशंसा रखना | आशंसा व इच्छा का अतिरेक आध्यात्म साधना का एक प्रतिकूल तत्व है, निराशंसा के साथ सहज जीवन जीओ व अपनी लालसाओं का अल्पीकरण करो |तपस्या मात्र निर्जरा के लिए ही हो व साधना का लक्ष्य सिर्फ संवर, निर्जरा ही हो | मुझे स्वर्ग नहीं चाहिए | लालसा, कामना व आशंसा दुःख का हेतु है, अतः निष्काम साधना ही सर्वोतम साधना है | कामना अध्यात्म की वाधक है व त्याज्य है | पदार्थों की नहीं, परम को तथा छोटे को नहीं दीर्घ को देखो | तुच्छ चीजों में मत उलझो | इच्छाओं को अल्पीकरण करो व त्याग को बढ़ाओ |

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साधना के साथ कभी सौदाबाजी न हो

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ आत्म-कल्याण व आत्म-हित के दश कारणों का उल्लेख किया है | वे दश हैं – १. अनिदानता – भौतिक सुख-सुविधा की प्राप्ति के लिए साधना को बेच देना व विनिमय करना कतेई उचित नहीं | यह थोड़े के लिए अधिक को खोने जैसा है | हम अनिदान वृति का पालन करते हुए निष्काम साधना करें व अपनी धृति को कमजोर न पड़ने दें २. दृष्टि-सम्पन्नता – हमारी दृष्टि यथार्थ व सम्यक रहे ३. योगवादिता - शांति व समाधि का जीवन जीना ४. क्षमा-शीलता - समर्थ होने पर भी क्षमा व शांति रखना ५. जितेन्द्रियता – इन्द्रिय-संयम रखकर जितेंद्रिय बनना ६. ऋजुता – सरलता से युक्त व धोखा-धड़ी से मुक्त रहकर छल-कपट न करना ७. ज्ञान,दर्शन,चारित्र में दृढ़ रहकर शिथिल न होना ८. सुश्रामण्य – पापश्रमण न बनकर सुश्रामण्य के पथ पर अग्रसर होना ९. प्रवचन-वात्सल्य – यथार्थ व आगम वाणी के प्रति अनुराग का भाव १०. आगम उद्भभावनता – आगम वाणी की प्रशंसा व प्रभावना करना | इन दश बातों से हमारा जीवन उज्जवल होता है | हम वर्तमान को भावी का निर्माता मानें व वर्तमान जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास करते रहें, साथ ही आगम का अनुशीलन व स्वाध्याय वृति का विकास होता रहे | हमारे पूर्व आचार्यों ने इस दिशा में बड़ा श्रम किया है, हम भी अच्छे वर्तमान, अच्छे भविष्य व भाव शुद्धि का प्रयास करें व जीवन को आत्म कल्याण का माध्यम बनाएं |

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हम परिपूर्ण ज्ञान प्राप्ति की ओर बढ़ें

हम परिपूर्ण ज्ञान प्राप्ति की ओर बढ़ें

ठाणं आगम के दशवें अध्याय में यहाँ सृष्टि व ज्ञान के संदर्भ में दश प्रकार का उल्लेख किया है | वे दश हैं –. १. धर्मास्तिकाय २ अधर्मास्तिकाय ३. आकाशास्तिकाय ४. अशरीरी-जीव ५. पुद्गल-परमाणु ६. शब्द ७. गंध ८. वायु ९. यह होगा या नहीं १०. यह सब दुखों का अंत करेगा या नहीं | शास्त्रकार ने एक बात बतलाई है – देखना एक सामान्य अवबोध व जानना एक विशेष बात | छ्दमस्त अर्थात आवरण युक्त, ज्ञानावर्णीय व दर्शानावर्णीय के उदयकाल में आदमी छ्दमस्त रहता है व इन कर्मो का क्षय हो जाने पर केवली बन जाता है, अन्तराय की भी कुछ अंश में भूमिका होती है | छ्दम- स्त का विलोम व विपरीत शब्द – केवली | छ्दमस्त के चार प्रकार – १. मति व श्रुति ज्ञान वाला जीव २, मति, श्रुति अवधि ज्ञान वाला ३. मति, श्रुति, मनःपर्याय ज्ञान वाला ४. मति, श्रुति, अवधि व मनःप्रयव ज्ञान वाला | सम्पूर्ण ज्ञान तो केवली के पास ही होता है, अवधि ज्ञान वाले को भी नहीं होता | धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय व अशरीरी जीव अरूपी तथा शब्द, रूप, गंघ व वायु ये चार चीजें रूपी है | रुपी को भी सम्पूर्णतया केवलज्ञानी हो जान सकते हैं, दूसरा कोई नहीं | ज्ञान की अंनतता विराट से भी ऊपर होती है | केवलज्ञानी के ज्ञान एक ही होता है और वह सम्पूर्ण ज्ञान | मति, श्रुत ज्ञान भी सबमें समान नहीं होता उसका भी तारतम्य रहता है व ज्ञान की क्षमता व वैदुष्य का भी | हम अपनी ज्ञान रश्मि को निर्मल बनाने का प्रयास करें

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अहिंसा धर्म एक शाश्वत धर्म है

अहिंसा धर्म एक शाश्वत धर्म है

अहिंसा का संदेश हमें धार्मिक साहित्य में उपलब्ध है | अहिंसा धर्म शाश्वत है व सभी सम्प्रदायों के लिए मान्य है | किसी गृहस्र्थी के लिए इसका पूर्ण-रूप से पालन करना कठिन है | इस कालचक्र में २४ तीर्थंकरों में पहले ऋषभ व अंतिम महावीर | जैन-परम्परा में श्वेताम्बर वे व दिगम्बर दो प्रकार के साधु | जिनके श्वेत-वस्त्र वे श्वेताम्बर व जो निर्वस्त्र होते हैं, वे दिगंबर | तेरापंथ – अर्थात - हे प्रभो ! यह तेरा ही पंथ है | आज से २६१ वर्ष पूर्व इसी मेवाड़ की धरा पर इसका प्रारम्भ हुआ | पुरुष साधु व स्त्री जाति साध्वियां | वे पांच महाव्रतों का पालन करने वाले होते है | पूर्ण अहिंसा – जिसमें छोटे बड़े किसी प्राणी का न वध किया जाता है न ही उसे कष्ट दिया जाता है | साधु वाहन में व चलकर पैदल ही चलते है, कहीं किसी प्राणी का वध न हो जाय | न वे भोजन पकाते हैं, न ही किसी से पकवाते हैं | अग्नि में भी जीव, वनस्पति में भी जीव | दूसरा महाव्रत – मृषावाद विरमण- झूठ से पूर्ण बचाव | तीसरा चोरी से बचाव | चौथा – पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन व पांचवां – पूर्ण अपरिग्रह का पालन | न उनके पास रुपैया पैसा व आभूषण, न ही कोई मकान और न उनके प्रति कोई ममत्व-भाव | एक कोटि समण जो वाहन का प्रयोग कर भारत व विदेशों में भी धर्म-प्रचार करते है | अभी जो अहिंसा यात्रा चल रही है उसके तीन मुख्य आयाम – सद्भावना, नैतिकता व नशा-मुक्ति | आज बोहरा समाज के धर्म-गुरु आये है व पारस्परिक-सौहार्द के पक्षधर है | अणुव्रत में भी मैत्री व सौहार्द पर बल दिया गया है, सब इस मार्ग पर चलें |

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इन्द्रियातीत चेतना का विकास होता हो

ठाणं आगम में दश प्रकार की संज्ञाओं का उल्लेख मिलता है – संज्ञा शब्द का अर्थ नाउन यहाँ से संबद्ध होना अभीष्ट नहीं लगता | वे दश नाम है – १. आहार २. भय ३. मैथुन ४. क्रोध ५. मान ६. माया ७. लोभ ८. लोक ९. ओभ संज्ञा इसमें ओभग एक ज्ञान है जिसे अंग्रेजी में इंस्टिंक्ट शब्द से पुकारा जा सकता है | हमें पांच इद्रियाँ प्राप्त है व उन इन्द्रियों से हमें कुछ बाह्य ज्ञान भी प्राप्त होता रहता है | इनसे हटकर जो ज्ञान प्राप्त होता है व वह होता है अतिन्द्रिय ज्ञान | आदमी आदमी में संज्ञाओं की भिन्नता होती है | किसी में किसी संज्ञा की प्रधानता व किसी में दूसरे की | भय की वृति में आदमी डरता रहता है | संग्रह की वृति में पदार्थों के प्रति लालसा बढ़ जाती है | मान में आदमी अपने आप को बड़ा मनाने लगता है | हमें इन संज्ञाओं को प्रतनू बनाना है | भय में जाप का अभ्यास एक आलम्बन बन सकता है, मन का बल रहे तो आदमी को शम्शान में भी भय नहीं सताता | लोभ को संतोष से व गुस्से को उपसम से पतला व कमजोर बनाएं | हम मोहात्मक संज्ञाओं को कम करें तो चेतना का विकास संभव है |

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